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इलेक्ट्रो होम्योपैथी में बहुत से विषैले पौधे प्रयोग किए जाते हैं


आप लोगों ने बहुत सारी वीडियोज़ सुने होंगे, बहुत सारी बुक्स पढ़ी होगी ज्यादातर बुक्स और वीडियो में यही वर्डिंग होती है कि इलेक्ट्रो होम्योपैथी में विष रहित 114 -115 पौधे प्रयोग  किए जाते हैं । यहां मेरा यह कहना है इलेक्ट्रो होम्योपैथी में हानि रहित पौधे नहीं प्रयोग किए जाते हैं । जो पौधे प्रयोग किए जाते हैं उनमें ज्यादातर पौधे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं । यहां हम एक बात स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हमने यहां पौधों के विषय में कहा है औषधियों के विषय में कुछ नहीं कहा है।


इस इस बात से यह नहीं समझना चाहिए कि इलेक्ट्रो होम्योपैथिक औषधियां हानिकारक है या विषयुक्त होती है । यह बिल्कुल गलत समझ है हमारे केवल पोस्ट की हेडिंग मात्र डालने पर ही बिना पोस्ट पढ़े लगभग 55 कमेंट तुरंत विरोध मे इस प्रकार के आ गए कि हम इलेक्ट्रो होम्योपैथी के खिलाफ में पोस्ट डाल रहे हैं। हमें ऐसा नहीं करना चाहिए।

इस बात से एक बात तो स्पष्ट हो गई कि इलेक्ट्रो होम्योपैथी में ज्ञान देने वाले गुरुजनो ने ऐसा ज्ञान दिया है कि ज्ञानी शिष्य  सच बात को भी स्वीकार करना नहीं चाहते है।

इलेक्ट्रो होम्योपैथी में प्रयोग होने वाले पौधे जो विषैले माने जाते हैं इनकी संख्या लगभग  80 है जो किसी न किसी रूप में थोड़ा बहुत विषैला प्रभाव डालते हैं। कुछ पौधे तो ऐसे हैं। जो भारी विषैले हैं और इनके लिए विशेष निर्देश दिया जाता है कि यह विषैले पौधे हैं इन्हें चिकित्सक की देखरेख में ही प्रयोग करना चाहिए 

इलेक्ट्रो होम्योपैथी में प्रयोग होने वाले कुछ विषैले पौधे


(1)  Conium

(2) Ipecacuanaha

(3) Aconitum

(4)  Podophyllum

(5) Belladonna

(6)  Nux vomica 

(7)  Lobelia

( इस तरह के पौधों की एक लंबी सूची है)

सभी पैथियों में  विषैले पौधों का प्रयोग किया जाता है।

जो पौधे इलेक्ट्रो होम्योपैथी में प्रयोग किए जाते हैं वही पौधे आयुर्वेद,और यूनानी में भी प्रयोग किए जाते हैं लेकिन उनमें में प्रयोग करने के तरीके अलग हैं और पौधों का पहले शोधन किया जाता है उसके बाद उसे प्रयोग किया जाता है इस प्रकार उनसे बनी औषधियां जहरीली नहीं होती है इलेक्ट्रो होम्योपैथी में भी कोहोबेशन प्रक्रिया एक प्रकार के शोधन की प्रक्रिया है। जिसमें पौधे की विषैले तत्व बाहर निकाल दिए जाते हैं।

होम्योपैथी एक ऐसी पैथी है जिसमें पौधों का शोधन नहीं किया जाता है।  सीधे विषैले पौधों का प्रयोग किया जाता है लेकिन होम्योपैथी में इतनी सूक्ष्म मात्रा में औषधि का प्रयोग किया जाता है कि उसका विषैला प्रभाव न के बराबर होता है। इसी  विषैले प्रभाव के कारण ही होम्योपैथी में औषधियां काम करती हैं। यदि इनका विषैला प्रभाव निकाल दिया जाए तो औषधियों की कार्य क्षमता कम हो जाएगी क्योंकि होम्योपैथी में सिंगल औषधि का प्रयोग करने विधान  रहा है। जो औषधियों बहुत विषैली होती हैं उन औषधियों के होम्योपैथी में मदर टिंचर उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं या चिकित्सक की देखरेख में प्रयोग कराए जाते हैं।

जब होम्योपैथिक विधि से अर्क निकाल कर इलेक्ट्रो होम्योपैथिक औषधियां बनाई जाती हैं तो उनमें विषैले प्रभाव भारी मात्रा में मौजूद रहते हैं।   इस विषैले  प्रभाव को कम करने के लिए " D " का प्रयोग करते हैं जिससे औषधि में वहिकल की मात्रा अधिक हो जाती है जिससे औषधि मे विषैले तत्वों की कमी हो जाती है। जिसके कारण शरीर पर इसका गहरा प्रभाव नहीं पडता है । हालांकि कहीं चूक हो जाने पर एग्रवेशन अवश्य कर जाती है। जैसे कि होम्योपैथी में होता है।

डी बनाते समय जब औषधि में वहिकल की मात्रा बढ़ा दी जाती है तो इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं होता कि इससे विषैला तत्व  बाहर निकल गया है। हां यह अवश्य होता है कि ज्यादा वहिकल में विषैला तत्व मिल गया है। जिससे उसका प्रभाव कम हो गया है।

जैसे एक तालाब में 1 लीटर विषैला पदार्थ मिला दिया जाए और तालाब के जीव जंतुओं को कोई नुकसान न पहुंचे तो इसका यह मतलब नहीं होता कि तालाब में विष नहीं है। तालाब में विष है अनुकूल परिस्थिति में वह अपना प्रभाव दिखा सकता है ।

एक कमेंट आया है D4 बनाने पर मेडिसिन में प्वाइजन (विष) नहीं रहता है अब आपको D4 की मेडिसिन का कितना विष रहता यह कैलकुलेशन बता रहे हैं।

यहां हमने 1 : 9 के अनुपात से डी बनाना शुरू किया है ( एक भाग मेडिसिन नौ भाग डिस्टिल्ड वाटर, यहां हमने एक भाग मेडिसिन को ही संकेत के लिए विष माना है ) । अब देखते हैं D1 में कितने भाग विष है D2 में कितना है D3 में कितना भाग है और D4 में कितने भाग विष रहता है । इसके बाद भी विष मौजूद रहता है ।

(1)   0.1---------D1

(2)   0.01------------D2

(3)   0.001---------D3

(4)   0.0001---------**D4

( D4 में यह विष की मात्रा है, जो अभी तक मौजूद है। यह संख्या रूप मे  0 .0001 है )

अब हम  कोहोबेशन के विषय में चर्चा करते हैं।

जब हम डिस्टिल वाटर में किसी प्लांट का अर्क निकालते हैं तो उसमें वही तत्व घुल पाते हैं जो डिस्टिल वाटर मे  घुल सकते है । डिजिटल वाटर में एल्केलाइड्स कम घुलते हैं या नहीं  घुलते है और एल्केलॉइड्स में ही अधिकतर विष पाए जाते हैं।

डिस्ट्रिक्ट वाटर में अर्क निकालने के बाद जब हम उसका कोहोबेशन करते हैं तो इस प्रक्रिया में जो विष (प्वाइजन) अर्क में आ गए थे वह अलग हो जाते हैं और विष रहित स्पेजिरिक  प्राप्त होती है। इस स्पेजिरिक से तैयार की गई इलेक्ट्रो होम्योपैथिक औषधि 100% विष रहित  औषधि होती है ।

नोट:

(1) बिना पोस्ट पढ़े कमेंट करना अच्छी मानसिकता को नहीं दर्शाता है ।

(2) पोस्ट को पढ़कर संबंधित कमेंट करना अच्छी मानसिकता का परिचायक होता है।

(3) किसी मात्र हेडिंग को पढ़कर अपने विचारों को व्यक्त कर देना भी अच्छी मानसिकता का परिचायक नहीं होता है।

(4) पूरी पोस्ट पढ़िए फिर संबंधित पोस्ट पर कमेंट कीजिए कमेंट से संतुष्ट न हो तो फोन कर बात कर सकते हो।

1 comment:

  1. अधिक से अधिक कॉमेंट करें ताकि आपके विचारों पर आधारित लेख लिखने में मदद मिले!

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