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विश्व में सीक्रेट रेमेडी का प्रचलन 

प्राचीन काल से विश्व के सभी देशों में सीक्रेट रिमेडिका प्रचलन रहा है। इसके अंतर्गत चिकित्सक, चिकित्सा तो करते थे पर दूसरे को उस चिकित्सा का ज्ञान नहीं देता थे । जिसके कारण विश्व को चिकित्सा जगत में बहुत बड़ी हानि हुई है। भारत में भी ऐसी चिकित्सा चलती थी और आज भी चल रही है । हालांकि लोगों में कुछ जागरूकता आई है लेकिन फिर भी अभी पूरी तरह से अंधकार समाप्त नहीं हुआ है ।


इस पर आगे कुछ कहने से पहले हम इस चिकित्सा के विषय में थोडा  प्रकाश डालना उचित समझता हूँ । हमने अपने प्रारंभिक जीवन  में देखा है कि उस समय गांव में चिकित्सक नहीं होते थे। कुछ हिंदुओं में  वैद्य और मुसलमानों में  हकीम हुआ करते थे। जो छोटी-छोटी पुस्तकों को पढ़कर कुछ जड़ी बूटियों का ज्ञान रखते थे और उसी से लोगों की निशुल्क चिकित्सा किया करते थे।

यह चिकित्सक  जड़ी बूटियों, खनिजों , और कुछ मन्त्रो का प्रयोग करते थे। लोग चिकित्सा तो करते थे परंतु दवा मे क्या देते थे यह किसी को पता नहीं होता था और न ही कोई पता करने का प्रयास करता था। यदि किसी को सीखना हो तो पहले उसे गुरु बनाए फिर वह सिखायेगा  वह भी  शिष्य से कह देता था कि आप किसी को बताना नहीं , बताओगे तो दवा काम नहीं करेगी । इस डर से लोग अपने नुक्से खोलते नहीं थे। इस प्रकार लोग गुरु की आज्ञा का वह जीवन भर पालन करते थे । यदि उसने अपने शिष्य को बताया तो ठीक और यदि शिष्य  बनाने से पहले ही उसकी मृत्यु हो गई तो उसका ज्ञान वहीं से समाप्त हो जाता था।

ऐसे बहुत  से लोग थे जो बहुत  अच्छी चिकित्सा करते थे लेकिन ज्ञान का फैलाव न होने के कारण उनकी मृत्यु के बाद वह फार्मूले लुप्त हो गए। यह केवल भारत में नहीं विश्व के सभी देशों में यही नियम बना हुआ था। इतना ही नहीं शिक्षित चिकित्सक भी अपने फार्मूले ओपेन नहीं करते थे।

अभी कुछ दिन पहले भारत सरकार की सख्ती के कारण चिकित्सक अपने फार्मूले ओपन करने लगे हैं । पहले यदि किसी चिकित्सक के पास दवा लेने जाओ तो चिकित्सक रैपर से गोलियां निकालकर 1-1 डोज  की पुडिया बना देता था और 1 शीशी मे अपने पास से मिक्सर बनाकर देता था। जिसके कारण लोगों को पता ही नहीं चलता था कि डॉक्टर ने क्या  दवा दिया है। जिस पर्चे से  दवा दी जाती थी। उस  पर्चे को चिकित्सक अपने पास ही रखना था। अगली बार जब दवा लेने जाओ तो अपना नाम बताओ कम्पाउंडर पर्चा  निकाल कर देगा फिर आपको दवा मिलेगी । अब भारत सरकार की शक्ति के कारण लोग रैपर में दवा देने लगे हैं ।और पर्चा भी देने लगे है पर्चे पर साफ-साफ दवा लिखने लगे हैं नहीं तो ऐसी राइटिंग लिखते थे कि कंपाउंडर और मेडिकल स्टोर वाला ही पढ़ पाए अर्थात रिमेडी को सीक्रेट बना रखा था ।

आज होम्योपैथी व इलेक्ट्रो होम्योपैथी में यही चल रहा है अपने रजिस्टर पर  दवा लिख लेते हैं और मरीज को केवल डिप की हुई गोलियां मिलती हैं कौन सी औषधि है इसकी कोई जानकारी नहीं होती है । आज बहुत से इलेक्ट्रो होम्योपैथिक चिकित्सक बड़े-बड़े दावे करते हैं । हमने गाल ब्लैडर से पथरी निकाल दी, कैंसर ठीक कर दिया, एड्स ठीक कर दिया ,कोरोना ठीक कर दिया, लेकिन जब उनसे नुक्सा पूछा जाता है  कि किस दवा से ठीक किया? कौन सा डायलूशन  दिया? तो बताने में कतराते रहते हैं। कहते हैं यह कैसे बता दूंगा फिर मेरा क्या होगा ? खोज मैने की है । वे यह भूल जाते हैं कि  आप जो काम कर रहे हैं जो दबा दे रहे हैं पहले वो किसी से सीखी थी। 
तो आज बताने में क्या दिक्कत है?

कुल मिलाकर आज भी  रिमेडी को सीक्रेट रखा रखना चाहते है। प्राचीन काल में विश्व में यह प्रथा चली आ रही है कि रिमेडी को सीक्रेट रखा जाए लेकिन कुछ विद्वान लोग हुए हैं जिनमें चरक सुश्रुत और अन्य लोग भी हैं जिन्होंने औषधियों के ग्रंथ बनाएं है उनका प्रचार प्रसार हुआ और आज लोग उसे लाभ उठा रहे हैं। कुछ लोगों ने उसे सीक्रेट रखने में ही अच्छा समझा था । इनमें काउंट सीजर मैटी और डॉक्टर फादर मूलर का नाम सामने आता है। दोनों लोगों के औषधियां बहुत अच्छा कार्य करती थी। काउंट सीजर मैटी की औषधियां गोलियों के रूप में थी। जिनके नंबर पड़े हुए थे और पांच तरल रूप में थी ( पांच बिजलियाँ ) ।  इन औषधियों के फार्मूले तो गुप्त थे लेकिन अपनी औषधीय गुणों की विशेषता के कारण दुनिया भर में फैली हुई थी । इसी तरह फादर मूलर के फार्मूले गुप्त थे और नंबरों के हिसाब से औषधियां दी जाती थी। यह भी बहुत अच्छी औषधियां थी।

हम डॉक्टर काउंट सीजर मैटी की बात करते हैं यदि उन्होंने औषधियों के फार्मूले ओपन किए होते तो आज इलेक्ट्रो होम्योपैथी का रूप ही बदला हुआ होता । दवा साजी और औषधि फार्मूले ISO जर्मन को दिए गए थे। उसने फार्मूले तो ओपन किए पर दवासाजी के  तरीकें गुप्त  रखें।  जिसके कारण इलेक्ट्रो होम्योपैथी में आज भ्रम की स्थिति बनी पड़ी है। हालांकि कुछ लोगों ने जैसे आज दवा साजी और फार्मूलो पर अनुमान लगाते हैं वैसे उस टाइम में भी अपना अनुमान लगाने लगे थे । वे अनुमान से ही इलेक्ट्रो होम्योपैथी के फार्मूले ओपन करने लगे है। जो मॉडर्न मेडिसिन नामक पत्रिका में छपे थे। यह फार्मूले ISO के फार्मूलो उसे मेल नहीं खाते है। इसलिए इन्हें इलेक्ट्रो होम्योपैथी  के फार्मूले नहीं कहा जा सकता है । दवा साजी  का तरीका आज भी किसी को नहीं पता है।

(1) पेटेंटों के फार्मूले आज भी सीक्रेट है !
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आज बाजार में बहुत सारे पेटेंट मिल रहे हैं जिसमें आयुर्वेद, होम्योपैथी, एलोपैथी, इलेक्ट्रो होम्योपैथी, यूनानी आदि हैं और सारे पेटेंटस के ऊपर उनके इनग्रेडिएंट लिखे हुए है  लेकिन यदि  उनके इनग्रेडिएंट्स के आधार पर आप अपने पेटेन्ट को बनाना चाहे तो पेटेंट वैसा काम नहीं करते जैसा आप बनाना चाहते हैं।

इसका मतलब है उसमें कुछ ऐसा डाल रखा है जो नहीं लिखा है। इसीलिए उसकी टक्कर का बन नहीं पाता है। इसी का फायदा उठाकर कंपनियां अपना माल भेजती है लोग ढूंढ ढूंढ कर उसी कंपनी का माल खरीदती है। जिसका फायदा करता है।

इन तमाम बातों से इस बात को बल मिलता है कि प्राचीन काल से ही एक गुट ऐसा रहा है जो औषधि को सीक्रेट रखा है और आज भी सीक्रेट रखना चाहता है। इससे समाज को नुकसान भी होता है और फायदा भी होता है। अब आपको समझना है कि समाज का नुकसान करना है या फायदा करना है।

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