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औषधि बनाने की अवैज्ञानिक विधि

काउन्ट सीजर मैटी ने इलेक्ट्रो होम्योपैथी की  औषधियां बनाई  थी और उसे सीक्रेट रिमेडी की तरह रखा था । उसी से वे ट्रीटमेंट करते रहे । औषधि बनाने के  अपने फार्मूले  किसी को नहीं दिए थे  बल्कि उन्हें एक डायरी में लिखें अपने पास रखे रहे थे।  जो उनकी मृत्यु के बाद उनके दत्तक पुत्र (दामाद) वेन्ट्रोकुली को प्राप्त हुए थे उन्होंने ही यह फार्मूले  जर्मन की ISO कंपनी को दिया था। विश्व में औषधि बनाने का काम ISO के अलावा किसी को नहीं पता है। क्योंकि किसी को औषधि बनाने की विधि बताई ही नहीं गई थी। एक विवाद में फंस कर जर्मन की ISO ने 1952 ई0 में केवल औषधियों के फार्मूले ओपन किए थे औषधि बनाने के तरीके ओपेन नहीं किए थे ।


लेकिन लाख छिपाने के बाद  सच्चाई कभी कभी निकल ही जाती है। काउंट सीजर मैटी से किसी के सामने बात बात में किसी प्रश्न के उत्तर में यह निकल गया था कि औषधियां कोहोबेशन के द्वारा बनाई जाती है । स्पेजिरिक  के भौतिक गुण भी गुण भी लोगों को पता चल गए थे  लेकिन कोहोबेशन करने की विधि नहीं पता थी  फिर क्या था इलेक्ट्रो होम्योपैथिक औषधियां बनाने के लिए लोगों ने तरह-तरह के उपाय सोचना शुरू कर दिया कुछ होम्योपैथ के जानकार लोगों ने इसमें सहयोग किया और इलेक्ट्रो होम्योपैथी को होम्योपैथी में तोड़ कर रख दिया। 

आज इलेक्ट्रो होम्यो पैथी की औषधि बनाने के  मुख्य रूप से दो तरीके होते हैं:----

(अ) पारम्परिक तरीका

जैसा कि हमने ऊपर बताया कि  काउंट सीजर मैटी ने किसी को को भी औषधि बनाने का तरीका नहीं बताया था । जर्मन की कंपनी ने केवल फार्मूले ओपन किए थे और फिर लोगों ने अपने अपने हिसाब से और औषधियां बनाना शुरू कर दिया । जिसने जो विधि बताई,और आपने आप जो समझ में आया, उसी हिसाब से लोगों ने औषधि बनाना शुरू कर दिया चूंकि औषधियों में पेड़ पौधे होते ही हैं वह काम करते गए । उन लोगों को विश्वास होता गया कि हमारी और औषधियां ही इलेक्ट्रो होम्योपैथिक औषधियां है जबकि वे औषधियां इलेक्ट्रो होम्योपैथिक नहीं है।

यहां हम कुछ पारंपरिक तरीके बता रहे हैं जो इलेक्ट्रो होम्योपैथिक औषधि बनाने के वैज्ञानिक तरीके नहीं है फिर भी औषधियां काम करती हैं और लोग इन्हें  इलेक्ट्रो होम्योपैथिक औषधियां ही मानते हैं।

(1) पौधों को जार में सडाना

लखनऊ में एक मेरे सीनियर मित्र थे एक बार मैं उनकी फार्मेसी में घूमते हुए गया तो उन्होंने बड़े हर्ष से मुझे अंदर बुलाया सोचा कि यह दवा लेने वाला अच्छा मुर्गा फंस गया है । उन्होंने अपनी फार्मेसी हमें दिखाई । यह भी बताया कि फला फला पौधे की यह स्पेजिरिक  निकल रही है। मैं सब देखता गया जब वह पूरी फार्मेसी दिखा चुके तो मैंने उनसे पूछा कि यह जो पौधे आपने जार में डाल रखा है। यह कितने दिनों से पडे हुए हैं। यह तो सड़ गए हैं कहने लगे जब सड जाते हैं तभी दवा बनती है । उनका जवाब था कोई 15 दिन से पड़ा है कोई 8 दिन से पड़ा है कोई महीनों से पड़ा हुआ है। तो मैंने उसमें ध्यान से देखा , तो उसमें फफूंद और कीडे लगे हुए थे । मैंने कहा इसमे तो कीडें लगे हुए हैं। कहीं लगे सड़ने का तो मतलब यही होता है। यही फर्मेंटेशन होता है।

मैंने मत्था पीटा, मन ही मन समझ गया लेकिन कुछ बोल नहीं सका क्योंकि हमारे सीनियर थे । सड़े हुए पानी को छानकर निकाल लेते हैं और फिर उसमें 1 : 9 के अनुपात मे डिस्टल वाटर मिलाकर D बनाते हैं।  जब पहली बार 1 : 9 का अनुपात करते हैं तो उसे D2 कहते हैं । जब  दूसरी बार करते हैं तो उसे D3 कहते हैं। और उसके बाद डाइल्यूशंस बनाते हैं। जो प्लांट के सडने के बाद में मूल अर्क निकालते हैं उसको D कहते हैं या प्लांट एक्सट्रैक्ट कहते हैं। यह उन्हीं के शब्द है। कुछ लोग प्लांट एक्सट्रैक्ट को od force  कहते हैं उसके बाद D1, D2, D3 बनाते हैं। D3 के बाद कुछ लोग डायलूशन बनाते हैं ।

(2) पौधौ को सूरज की रोशनी में सड़ाना

शिक्षा का प्रसार हुआ कुछ लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया कि पौधों में कीड़े पड़ जाते हैं इसलिए दवाइयां दूषित हो जाती हैं कोहोबेशन/फर्मेन्टेशन तो 38 डिग्री सेंटीग्रेड पर होता है। यह तो गलत बनाते हैं। लोगों ने दिमाग लगाया और उसमें सुधार करने की बात करने लगे कहने लगे।कहने लगे वह तरीका गलत है हमारा तरीका सही है। सूरज का प्रकाश लगभग 38 डिग्री सेंटीग्रेड होता है और उसमें सौर ऊर्जा होती है सूरज की रोशनी में ही फर्मेंटेशन करना उचित है। इनके अनुसार:------

एक शुध्द साफ सुथरी  हर्ब  को लेते हैं और एक जार में  डिस्टल वाटर डाल कर उसमें हर्ब  को डुबो देते हैं और जार को धूप में रख देते हैं। कभी-कभी जार में डिस्टल वाटर खौला कर ठंडा कर लेते हैं फिर डालते हैं । यदि डिस्टिल वाटर में सूखी हर्ब में डाला है तो दो-तीन दिन के बाद उसे निकाल कर बाहर कर देते हैं और उसमें नई हर्ब में डाल देते हैं । इस तरह जब संतुष्ट हो जाते हैं कि हर्ब अब इसमें सर नहीं सड रही है तब उसे छानकर बाहर निकाल लेते हैं इसको D कहते हैं।

कभी-कभी डिस्टिल वाटर में हरी हर्ब डालते हैं दो-तीन दिन के बाद फिर उसे निकाल लेते हैं इनका मानना होता है जब हरी हर्ब में नए किल्ले निकलने लगे तो समझ लो स्पेजिरिक तैयार हो गई है। उसे जानकर साफ कर लेते हैं। इस प्लांट ऐस्ट्रैक्ट को भी D कहते हैं कोई कोई इसे odd फोर्स कहता है। इसके आगे D2 व D3 बनाते हैं इनके अनुपात भी लोग अपने अपने हिसाब से अलग-अलग रखते हैं। कोई 1 : 9 , कोई 1 : 47 , कोई 1 : 49 कोई , 1 : 99 रखते हैं । कोई D3 के बाद डाइल्यूशन बनाता है कोई कहता है डाइल्यूशन में स्टोक के मारने की कोई आवश्यकता नहीं है। कोई स्टोक मार कर बनाता है। तो कोई कहता है D3 को पानी में मिलाकर सीधे पिलाना शुरू कर दो। कोई कोई सजन D4, D5, D6, D7, D8, D9, D10 तक बनाते हैं।

(3) अर्क निकालने के बाद ऐश (राख) बनाना

इस के अंतर्गत पहले फर्मेंटेशन करते हैं जैसे कि ऊपर हमने बताया है। उसके बाद उसको एक फ्लासक में डालकर 60 से 100 डिग्री ( अलग अलग लोग अलग अलग टेंपरेचर पर डिस्टिलेशन करते हैं) के बीच डिस्टिलेशन करते हैं और भाप को द्रवित कर जल बनाते हैं इसे स्पेजिरिक कहते हैं और वाष्पन करने के बाद फ्लास्क में जो तलछट पड़ता है। उसे जलाकर राख बना देते हैं। और उसे भी औषधि के रूप में प्रयोग करते हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि औषधि बनाने का किसी के पास कोई सर्व मान्य व वैज्ञानिक तरीका नहीं है। सब अपने अपने हिसाब से बनाते हैं इसलिए औषधियों एकरूपता न  होने के कारण प्रैक्टिस करने में बहुत कठिनाई आती हैं ।

(ब) वैज्ञानिक तरीका

इलेक्ट्रो होम्योपैथिक औषधि बनाने का तरीका वैज्ञानिक होना चाहिए। जो विज्ञान की कसौटी पर खरा उतरे और उसमें 100% हाइजीन होनी चाहिए। जब फर्मेंटेशन करते हैं तो हर्ब सड जाती है और आप जानते हैं कि कोई चीज तभी सडती है जब उसमें बैक्टीरिया पनप जाता है । उसमें फफूंद भी लगेगी और बाद में उसमे बदबू भी आएगी और यह भी जानते हो जिस चीज में फफूंद लग जाती है और हानि कारक बैक्टीरिया पनप जाता है उसकी गुणवत्ता कम हो जाती है फिर इन औषधियों की गुणवत्ता कैसे अच्छी हो सकती है ????? जब हमने औषधि निर्माताओं से इस प्रश्न का जवाब मांगा तो का कहना था कि Od फोर्स / प्लांट एक्सट्रैक्ट /  D का बहुत छोटा भाग औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है इसलिए न वह हानिकारक है न ही औषधि मे गंदगी है। क्या आप लोग भी यही सही मानते हैं ???? हमारी समझ से आप लोग कभी इसे सही नहीं मानेंगे।

हमारी दूसरी बुक ओड फोर्स, कोहोबेशन, स्पेजिरिक, डायलूशन,टार्चुरेशन पर आने वाली है । इसलिए उन सारी चीजों को हम यहां स्पष्ट नहीं कर सकते हैं। जब बुक प्रिंट हो जाएगी तब हम  उसे ग्रुप से उसे स्पष्ट करेंगे । हमारा दावा है कि  दुनिया का कोई भी व्यक्ति हमारे बनाए हुए तरीके से इलेक्ट्रो होम्योपैथी अवैज्ञानिक, अनहाईजिनिक,  होम्योपैथी या आयुर्वेद नहीं साबित कर सकता है।

नोट :---

(1) होम्योपैथी में अनेक गंदी चीजों जैसे चेचक के वायरस से, बलगम से, जंतुओं के विष से औषधियां तैयार की जाती है लेकिन यहां एक बात स्पष्ट करना चाहूंगा कि वहां फर्मेंटेशन नहीं होता है । कोई चीज सडाई नहीं जाती है। उसमें बैक्टीरिया नहीं पनपता है, उसमें फफूंद नहीं लगती है जीवो की वाइटल फोर्स ज्यों की त्यों सुरक्षित रहती है।

(2) हमने यहां कुछ ही अनहाईजेनिक और अवैज्ञानिक तरीके से औषधियां बनाने की विधियां बताई है। लोग अनेकों तरीकों से औषधियां बनाते हैं। जिन्हे वैज्ञानिक विधि नहीं कहा जा सकता हैं ।

डॉ अशोक कुमार मौर्य

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